Aacharya Parichay

Aacharya Pushpdant & Bhutbali

आचार्य पुष्पदन्त और आचार्य भूतबली

 

जीवन-परिचय आचार्य पुष्पदन्त और आचार्य भूतबली का नाम साथ-साथ हो प्राप्त होता है, पर पुष्पदन्त आचार्य को भूतबली आचार्य से ज्येष्ठ माना गया है। दोनों ही आचार्य आचार्य घरसेन के पास श्रुत (शास्त्र) की शिक्षा प्राप्त करने गये थे। पुष्पदन्त आचार्य का समय वीर-निर्वाण संवत् 633 के पश्चात् ईसवी सन् प्रथम द्वितीय शताब्दी के लगभग माना जाता है। इनका समय 30 वर्ष माना जाता है। आचार्य पुष्पदन्त का जन्मस्थान करहाट के आसपास माना जाता है। वर्तमान में सतारा जिले का करहाट नगर ही इनका जन्मस्थान माना जाता है। शिक्षा समाप्ति के पश्चात् सुन्दर दाँतों के कारण इनका नाम पुष्पदन्त था।

आचार्य पुष्पदन्त अर्हद्बली के शिष्य थे। आचार्य अर्हद्बली ने ही पुष्पदन्त और भूतबली आचार्य को श्रुत की शिक्षा प्राप्त करने के लिए आचार्य धरसेन के पास भेजा था। उनके पास रहकर ही दोनों आचार्यों ने महत्कर्मप्रकृतिप्रभूतको शिक्षा प्राप्त की थी। अतः इनके दीक्षागुरु अर्हद्बली और शिक्षागुरु आचार्य धरसेन हैं।

प्रतिभा : आचार्य पुष्पदन्त अपने समय के आचार्यों में अत्यन्त मान्य थे और इसीलिये वे मुनिसमिति के सभापति कहलाते थे। इन्होंने ही षटखण्डागम ग्रन्थ की रचना का कार्य आरम्भ किया था। आचार्य पुष्पदन्त प्रतिभाशाली एवं ग्रन्थ निर्माण में निपुण थे। आचार्य पुष्पदन्त ने अपनी रचना जिनालित को पढ़ायी और अपने को अल्प आयु समझकर गुरुभाई भूतबली को अवशिष्ट कार्य को पूर्ण करने के लिये प्रेरित किया।